ख़ुदा से भी नहीं रिश्ता हमारा

न जाने कौन है अपना हमारा

अ'अज़ हो जाते हम सबके लिए पर
किसी से जी नहीं मिलता हमारा

किताबें बोझ बनती जा रही है
बिखरता जा रहा सपना हमारा

अभी मिलने को दो दिन ही हुए थे
कि ग़ुस्सा खा गया रिश्ता हमारा

लिपट कर रोता हूँ दरवाज़े से तो
सिसक कर रोता है परदा हमारा

तुम्हारी  साड़ियों  से  ही  भरेगा
पड़ा है ख़ाली जो बक्सा हमारा

कभी तो हम भी तुम से ये कहेंगे
बहुत  प्यारा  हुआ  बेटा  हमारा

— Piyush Nishchal

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Khafa Shayari

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