अम्न के दिन अब भुला कर देखना है
फूल सहरा में उगा कर देखना है
धुँदली कर दी इश्क़ ने हर चीज़ सो अब
इश्क़ का पर्दा हटा कर देखना है
बज़्म में पूछा किसी ने तुम कहाँ हो
अब वहाँ ख़ुद को बुला कर देखना है
रौशनी होती नहीं राहों में अबदन
रात आँखों को दिखा कर देखना है
कब से आईना नहीं देखा नज़र ने
रूप को अपने सजा कर देखना है
रख वरक़ पे चीख़ती ग़म की सियाही
ज़िंदगी को मुस्कुरा कर देखना है
— Prakash Pandey















