ham pe ehsaan hain udaasi ke | हम पे एहसान हैं उदासी के

  - Varun Anand

हम पे एहसान हैं उदासी के
मुस्कुराएँ तो शर्म आती है

  - Varun Anand

Depression Shayari

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    उम्र भर मेरी उदासी के लिए काफ़ी है
    जो सबब मेरी ख़मोशी के लिए काफ़ी है

    जान दे देंगे अगर आप कहेंगे हमसे
    जान देना ही मुआफ़ी के लिए काफ़ी है
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    Aakash Giri
    रात बेचैन सी सर्दी में ठिठुरती है बहुत
    दिन भी हर रोज़ सुलगता है तिरी यादों से
    Amit Sharma Meet
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    मज़ा चहिए जो आख़िर तक उदासी से मोहब्बत कर
    ख़ुशी का क्या है कब तब्दील है से थी में हो जाए
    Atul K Rai
    सभी के साथ दिखना भी मगर सबसे जुदा रहना भी है उसको
    उदासी साथ भी रखनी है और तस्वीर मे हँसना भी है उसको
    Kafeel Rana
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    मेरे नादाँ दिल उदासी कोई अच्छी शय नहीं
    देख सूखे फूल पर आती नहीं हैं तितलियाँ
    Deepak Vikal
    ज़िंदगी भर वो उदासी के लिए काफ़ी है
    एक तस्वीर जो हँसते हुए खिंचवाई थी
    Yasir Khan
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    मैं वो नाकाम मुसव्विर हूँ जो ख़ुद के हाथों
    एक उदासी के सिवा कुछ न बना पाया है
    Ashutosh Vdyarthi
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    कहा जो कृष्ण ने गीता में रक्खेगा अगर तू याद
    भले जितना घना जंगल हो पर तू खो नहीं सकता
    Amaan Pathan
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    गर उदासी, चिड़चिड़ापन, जान देना प्यार है
    माफ़ करना, काम मुझको और भी हैं दोस्तो
    Divy Kamaldhwaj
    मेरे महबूब मत बेचैन होना
    तेरे क़ासिद ने ख़त पहुँचा दिया है
    Shajar Abbas

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    तिरे चेहरे की रौनक़ खा रहा है
    ये किसका ग़म तुझे तड़पा रहा है।

    हमारा सब्र तो पूरा रहा था
    हमारा फल मगर फीका रहा है

    मै उसका सातवाँ हूँ इश्क़ तो क्या
    वो मेरा कौनसा पहला रहा है।

    तिरा दुख है तो क्या हैं रोज़ के दुख
    नये पौदों को बरगद खा रहा है।

    बिछड़ने में मज़ा भी था सज़ा भी
    मैं अब ख़ुश हूँ तो वो पछता रहा है

    हमारे दरम्याँ उलफ़त नहीं है
    हमारे बीच समझौता रहा है

    अजाइब घर में रक्खी जाएँगी सब
    वो जिस-जिस चीज़ को छूता रहा है

    खड़ी है शाम फिर बाहें पसारे
    कोई भूला सहर का आ रहा है
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    Varun Anand
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    दुनिया में और वक़्त बिताने का मन नहीं
    लेकिन ख़ुदा के पास भी जाने का मन नहीं

    बैठे हैं और ख़ाक हुए जा रहे हैं हम
    फिर भी तिरे दयार से जाने का मन नहीं

    मन कह रहा है आज हक़ीक़त करें बयाँ
    लेकिन तिरे ख़िलाफ़ भी जाने का मन नहीं

    मजबूर हो के उस से गले मिल रहे हैं हम
    वो जिससे हम को हाथ मिलाने का मन नहीं

    कर सकता हूँ मै बंद भी कश्ती का वो सुराख़
    पर आज अपनी जान बचाने का मन नहीं

    इक रोग है जो तुझको बताना नहीं कभी
    इक ज़ख़्म है जो तुझको दिखाने का मन नहीं
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    Varun Anand
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    ग़ज़ल की चाहतों अशआ'र की जागीर वाले हैं
    तुम्हें किस ने कहा है हम बरी तक़दीर वाले हैं

    वो जिन को ख़ुद से मतलब है सियासी काम देखें वो
    हमारे साथ आएँ जो पराई पैर वाले हैं

    वो जिन के पाँव थे आज़ाद पीछे रह गए हैं वो
    बहुत आगे निकल आएँ हैं जो ज़ंजीर वाले हैं

    हैं खोटी निय्यतें जिन की वो कुछ भी पा नहीं सकते
    निशाने क्या लगें उन के जो टेढ़े तीर वाले हैं

    तुम्हारी यादें पत्थर बाज़ियाँ करती हैं सीने में
    हमारे हाल भी अब हू-ब-हू कश्मीर वाले हैं
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    Varun Anand
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    तेरी निगाह-ए-नाज़ से छूटे हुए दरख़्त
    मर जाएँ क्या करें बता सूखे हुए दरख़्त

    हैरत है पेड़ नीम के देने लगे हैं आम
    पगला गए हैं आपके चूमे हुए दरख़्त
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    Varun Anand
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    सच बताएँ तो शर्म आती है
    और छुपाएँ तो शर्म आती है

    हम पे एहसान हैं उदासी के
    मुस्कुराएँ तो शर्म आती है

    हार की ऐसी आदतें हैं हमें
    जीत जाएँ तो शर्म आती है

    उसके आगे ही उसका बख़्शा हुआ
    सर उठाएँ तो शर्म आती है

    ऐश औकात से ज्यादा की
    अब कमाएँ तो शर्म आती है

    धमकियाँ ख़ुदकुशी की देते हैं
    कर न पाएँ तो शर्म आती है
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    Varun Anand
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