“ख़्वाबों के बुलबुले”

एक बुलबुले सा था मेरा ख़्वाब
कोशिश की दिल ने छूने की
फूट गया
अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती
अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते

कि जब मेरे मुक़द्दर में ख़्वाब मुकम्मल होना न था
और दिल को शब-ए-बेकशी में सोना न था
आरज़ू थी कि कोई बुलबुलों को फूटने से बचाए
और वो प्यार से देखे उन को
फिर गले लगाए

पर हवाओं को भला दिल के अरमानों की क्या फ़िक्र
जाने कहाँ ले गईं वो ख़्वाबों को मुझ से दूर
कितनी मर्तबा समझाया मैं ने
मगर दिल अब भी बे-क़रार है
वो आएँगे नहीं शायद
फिर भी उन का इंतिज़ार है

इस हिज्र में ये दिल अब टूट के बिखर न जाए
बिना कश्ती कहीं यादों के समुंदर में उतर न जाए
अच्छा होता उस शाम बारिश ही न होती
अच्छा होता ख़्वाबों के बुलबुले ही न बनते

— Prakash Pandey

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