ढूँढ़ते साहिल समुंदर और मैं
शोर यादों का ये पिंजर और मैं
कहने को ये बे-ज़बाँ दीवार दर
पर बहुत बातें करें घर और मैं
बीत जाते जो सुहाने दिन यूँ ही
रह गए बाक़ी वो मंज़र और मैं
चाँद से ही तीरगी मिटती नहीं
रौशनी फैलाते अख़्तर और मैं
'प्रीत' दुनिया ये गुलिस्ताँ सी नहीं
नफ़रतों के लगते लश्कर और मैं
— Harpreet Kaur















