ज़रूरत ही न हाल-ए-दिल किसी को भी बताने की
है आदत पीठ पीछे सब को यूँ खिल्ली उड़ाने की
करें बातें ज़माना अपने हक़ भर की ही हरदम यूँ
कहाँ फ़ुर्सत किसी को फ़र्ज़ भी अपने निभाने की
रहें मसरूफ़ पापी पेट की ख़ातिर ये दुनिया अब
सभी की आरज़ू है बस बहुत पैसा कमाने की
गुज़रती ज़िन्दगी ये ओढ़ जिम्मेदारी की चादर
नहीं चाहत रही आँखों में ख़्वाबों को सजाने की
फ़साना भर मुहब्बत 'प्रीत' की कोई अगर माने
ग़ज़ल और शा'इरी बातें ये तो लिखने लिखाने की
— Harpreet Kaur















