ज़िन्दगी भी गुज़र ख़्वाहिशों में गई
ख़ुद को क्यूँ ढूँढ़ने क़ाफ़िलों में गई
अब किसी से गिला और न शिकवा रहा
जब से रब से मिली रहमतों में गई
यूँ घटाएँ है छाईं ये सावन की फिर
चाँदनी छुप के अब बादलों में गई
फोन का ये नशा सिर चढ़ा है यूँ कुछ
ज़ीस्त तो बस इन्हीं फ़ासलों में गई
यूँ निभाने लगी 'प्रीत' अब क़ाफ़िए
इक ग़ज़ल और लो शाइरों में गई
— Harpreet Kaur















