bajte hue ghunghroo the udti hui taanein theen | बजते हुए घुंघरू थे उड़ती हुई तानें थीं

  - Qaisar-ul-Jafri

बजते हुए घुंघरू थे उड़ती हुई तानें थीं
पहले इन्ही गलियों में नग़्मों की दुकानें थीं

यूँँ बैठ रहीं दिल में शोरीदा तमन्नाएँ
गोया किसी जंगल में पत्तों की उड़ानें थीं

यारब मिरे हाथों में तेशा भी दिया होता
हर मंज़िल-ए-हस्ती में जब इतनी चटानें थीं

वो लम्हा-ए-लर्ज़ां भी देखा है सर-ए-महफ़िल
इक शोले की मुट्ठी में परवानों की जानें थीं

हम मरहला-ए-ग़म में तन्हा थे कहाँ यारो
क़ातिल थे सलीबें थीं तेग़ें थी सिनानें थीं

इक हर्फ़-ए-मोहब्बत यूँँ फैला कि गुनह ठहरा
अफ़्साने हमारे थे दुनिया की ज़बानें थीं

  - Qaisar-ul-Jafri

Shama Shayari

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