zakhamon ko marham kahtaa hooñ qaateel ko maseeha kahtaa hooñ | ज़ख़्मों को मरहम कहता हूँ क़ातिल को मसीहा कहता हूँ

  - Qaisar-ul-Jafri

ज़ख़्मों को मरहम कहता हूँ क़ातिल को मसीहा कहता हूँ
जो दिल पर गुज़रा करती है मैं पर्दा पर्दा कहता हूँ

ज़ुल्फ़ों को घटाएँ कहता हूँ रुख़्सार को शो'ला कहता हूँ
तुम जितने अच्छे लगते हो मैं उस से अच्छा कहता हूँ

अब रीत यही है दुनिया की तुम भी न बनो बेगाना कहीं
इल्ज़ाम नहीं धरता तुम पर इक जी का धड़कना कहता हूँ

अरबाब-ए-चमन जो कहते हैं वो नाम मुझे मा'लूम नहीं
जिस शाख़ पे कोई फूल न हो मैं उस को तमन्ना कहता हूँ

'क़ैसर' वो नवा ला-हासिल है जो आ के लबों पर लहराए
छू ले जो दिलों की गहराई मैं उस को नग़्मा कहता हूँ

  - Qaisar-ul-Jafri

Zulf Shayari

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