बा-ख़बर था इक नज़र में दो-जहाँ ले जाएगा

मेरी जाँ बन कर वो इक दिन मेरी जाँ ले जाएगा

आख़िरी हिचकी से पहले चारा-गर से पूछ लूँ
जो नज़र आता नहीं रिश्ता कहाँ ले जाएगा

मय-कदा दैर-ओ-हरम या कोई दीवानों की बज़्म
तुझ से ये बिछड़ा हुआ लम्हा कहाँ ले जाएगा

वो जो पिछले साल सब खेतों को सोना दे गया
अब के वो तूफ़ान किस किस का मकाँ ले जाएगा

वो चला जाएगा मुझ से कर के इक़रार-ए-वफ़ा
तोड़ जाएगा सफ़ीना बाद-बाँ ले जाएगा
इश्क़ में उस ने जलाना ही नहीं सीखा कभी
आग दे जाएगा मुझ को ख़ुद धुआँ ले जाएगा

— Qamar Jalalabadi

More by Qamar Jalalabadi

Other ghazal from the same pen

See all from Qamar Jalalabadi →

Romance Shayari

Shers of romance.

All Romance Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling