ham ne KHud apni rahnumaai ki | हम ने ख़ुद अपनी रहनुमाई की

  - Rahat Indori

हम ने ख़ुद अपनी रहनुमाई की
और शोहरत हुई ख़ुदाई की

मैं ने दुनिया से मुझ से दुनिया ने
सैकड़ों बार बे-वफ़ाई की

खुले रहते हैं सारे दरवाज़े
कोई सूरत नहीं रिहाई की

टूट कर हम मिले हैं पहली बार
ये शुरूआ'त है जुदाई की

सोए रहते हैं ओढ़ कर ख़ुद को
अब ज़रूरत नहीं रज़ाई की

मंज़िलें चूमती हैं मेरे क़दम
दाद दीजे शिकस्ता-पाई की

ज़िंदगी जैसे-तैसे काटनी है
क्या भलाई की क्या बुराई की
'इश्क़ के कारोबार में हम ने
जान दे कर बड़ी कमाई की

अब किसी की ज़बाँ नहीं खुलती
रस्म जारी है मुँह-भराई की

  - Rahat Indori

Aazaadi Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Rahat Indori

As you were reading Shayari by Rahat Indori

Similar Writers

our suggestion based on Rahat Indori

Similar Moods

As you were reading Aazaadi Shayari Shayari