काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं

और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं

आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत
हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं

हम पे हाकिम का कोई हुक्म नहीं चलता है
हम क़लंदर हैं शहंशाह लक़ब करते हैं

देखिए जिस को उसे धुन है मसीहाई की
आज कल शहर के बीमार मतब करते हैं

ख़ुद को पत्थर सा बना रक्खा है कुछ लोगों ने
बोल सकते हैं मगर बात ही कब करते हैं

एक इक पल को किताबों की तरह पढ़ने लगे
उम्र भर जो न किया हम ने वो अब करते हैं

— Rahat Indori

More by Rahat Indori

Other ghazal from the same pen

See all from Rahat Indori →

Sooraj Shayari

Shers of sooraj.

All Sooraj Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling