ud rahe hain sab parinde ghar sajaane ke li.e | उड़ रहे हैं सब परिंदे घर सजाने के लिए

  - Raj Tiwari

उड़ रहे हैं सब परिंदे घर सजाने के लिए
हम ने भी तो जाने से पहले कई वादे लिए

आख़िरस मैं कौन से मुखड़े पे करता एतबार
वो जब आया भी तो आया चहरे पर चहरे लिए

तुम मुहब्बत से नवाज़ो नफरतों को भी कभी
कीजिए साया कभी सूखे दरख़्तो के लिए

मेरे दरवाज़े पे दस्तक होगी तेरी एक दिन
ख़्वाब ठहरें हैं इन आँखों में कई लम्हे लिए

मैं जहाँ से लौट आया था सफ़र में हारकर
बस ख़डी थी ज़िंदगी उस मोड़ पर मेरे लिए

एक घर सूखा पड़ा था मुद्दतों से शहर में
दूर से आई है बारिश फिर से नज़राने लिए

इक किनारा ख़ामुशी से देखता है जब मुझे
तब मचलता है समंदर पानी में लहरे लिए

कोई सुनता ही नहीं है ख़ामुशी की जब सदा
'राज' क्यूँ सब दर-ब-दर फिरते हैं आवाज़े लिए

  - Raj Tiwari

Aahat Shayari

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