हमारी ज़िंदगी ऐसी लबों पे प्यास हो जैसे
गगन को इस ज़मीं से इक मिलन की आस हो जैसे
मिलन की इक घड़ी है इक जुदाई से भरा मंज़र
यही दो पल हमारी ज़िंदगी में ख़ास हो जैसे
दबा हूँ फ़र्ज़ के बोझों से यूँ मैं उठ नहीं सकता
किसी के पाँव के नीचे कोई इक घास हो जैसे
नमी आँखों में थी उस की उदासी शक़्ल पे छाई
उसे लगता जुदाई का हुआ एहसास हो जैसे
हुए नाक़ाम उल्फ़त में हमारा हाल है ऐसा
कोई लड़की परीक्षा में हुई नइँ पास हो जैसे
गए हो तुम मेरे दिल से मगर यादें नहीं जातीं
यही महसूस होता तुम अभी भी पास हो जैसे
— Ram Singar Malak















