इश्क़ कर के रोज़ उस
में तू जला कर
कोई मंज़िल ही नहीं बस तू चला कर
सोचता हूँ दर्द अपने फूँक डालूँ
जिस्म तेरा सर्द रातों में जला कर
साहिब-ए-मसनद ग़ुलामी चाहते हैं
शाह वाले सर झुका के अब चला कर
— Rizwan Khoja "Kalp"
में तू जला कर
कोई मंज़िल ही नहीं बस तू चला कर
सोचता हूँ दर्द अपने फूँक डालूँ
जिस्म तेरा सर्द रातों में जला कर
साहिब-ए-मसनद ग़ुलामी चाहते हैं
शाह वाले सर झुका के अब चला कर
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