उसे जो हाथ लगाया तो वो पराया हुआ
धरा ही रह गया कमरा सजा सजाया हुआ
मैं सारेगामा की बारीकियों से नावाकिफ़
वो एक अंतरा बागेश्री में गाया हुआ
कहाँ वो मार्क्स पढ़ाता है एक कॉलेज में
कहाँ मैं नोट एक मज़दूर का कमाया हुआ
मैं हर नमाज़ के आख़िर में उस से कहती हूँ
तू इक ख़ुदा है मेरे हाथ का बनाया हुआ
उसे भी नींद ने मोहलत न दी मुहब्बत की
मुझे भी था छः के अलार्म ने जगाया हुआ
— Ruqayyah Maalik















