ज़ीस्त महव-ए-सहाब हो जैसे
मुझ में तेरा शबाब हो जैसे
इस अक़ीदत से चुप ही रहते हैं
तेरी सुनना सवाब हो जैसे
रख के सर पे गली में बेची है
ये मोहब्बत अज़ाब हो जैसे
उस की नज़रों में देर तक देखा
मेरी आँखों का ख़्वाब हो जैसे
तेरे दर पे सुकूँ नहीं मिलता
मेरी निय्यत ख़राब हो जैसे
उस के ख़त को सँभाल रक्खा है
इक मुक़द्दस किताब हो जैसे
ऐसे रखा रहा किताबों में
हुस्न उस का गुलाब हो जैसे
जुस्तुजू की ये मौत है साहब
तेरा मिलना सराब हो जैसे
— Sabahat Urooj















