रास्ते लाख सही कोई भी रहबर न लगे
ये भी मुमकिन है कि दर वा हो मगर दर न लगे
अजनबी लोग हैं उस पार की बस्ती में मगर
मुझ को इस पार भी अपना तो कोई घर न लगे
ऐसे बिछड़ा कि ज़माने से वो लौटा ही नहीं
है दुआ ऐसे परिंदे को कभी पर न लगे
अब कि ढूँडूँगी ठिकाना मैं कोई दश्त के पास
यूँँ सर-ए-आम तमाशे का जहाँ डर न लगे
अक्स है अक्स अरे उस का तक़ाज़ा भी समझ
आँख शीशे का मुक़द्दर है तो पत्थर न लगे
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Sabahat Urooj
our suggestion based on Sabahat Urooj
As you were reading Ibaadat Shayari Shayari