रास्ते लाख सही कोई भी रहबर न लगे

ये भी मुमकिन है कि दर वा हो मगर दर न लगे

अजनबी लोग हैं उस पार की बस्ती में मगर
मुझ को इस पार भी अपना तो कोई घर न लगे

ऐसे बिछड़ा कि ज़माने से वो लौटा ही नहीं
है दुआ ऐसे परिंदे को कभी पर न लगे

अब कि ढूँडूँगी ठिकाना मैं कोई दश्त के पास
यूँ सर-ए-आम तमाशे का जहाँ डर न लगे

अक्स है अक्स अरे उस का तक़ाज़ा भी समझ
आँख शीशे का मुक़द्दर है तो पत्थर न लगे

— Sabahat Urooj

More by Sabahat Urooj

Other ghazal from the same pen

See all from Sabahat Urooj →

Dua Shayari

Shers of dua.

All Dua Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling