मुक़ाबले के न हम दुश्मनी के क़ाबिल हैं
ज़हीन लोग हैं बस आशिक़ी के क़ाबिल हैं
जो अपनी मर्ज़ी का सोचें तुम उन को दफ़ना दो
कि ऐसी लड़कियाँ कब रुख़्सती के क़ाबिल हैं
दुखी नहीं हैं कि हम क्यूँ हुए नज़र-अंदाज़
हमें पता है कि हम बे-रुख़ी के क़ाबिल हैं
हमें डराया गया कब सिखाया डट जाना
हम ऐसे लोग फ़क़त आजिज़ी के क़ाबिल हैं
लड़ाई हम को विरासत में दी गई है हुज़ूर
हम अहल-ए-जंग कहाँ शाइ'री के क़ाबिल हैं
किसी वबा में ख़ुदा हम को मुब्तला करेगा
हम ऐसे लोग कहाँ ख़ुद-कुशी के क़ाबिल हैं
— Sabahat Urooj















