तग़ाफ़ुल तिरा गो गवारा न था
तिरे बिन हमारा गुज़ारा न था
भरी बज़्म में गो पुकारा न था
नज़र से मगर कब इशारा न था
बड़े बा-वफ़ा थे मिरे यार सब
मुसीबत में जब तक पुकारा न था
लब-ए-नाख़ुदा पे था नाम-ए-ख़ुदा
कि जब दस्तरस में किनारा न था
शब-ए-वस्ल था बस यही इक मलाल
कि बस में सहर का सितारा न था
रहा ज़िंदगी से 'सदा' ये गिला
कि दौर-ए-जवानी दुबारा न था
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