जब गिरे ज़ुल्फ़ तो फिर उस को सँभाला जाए
यूँ निगाहों का भरम दिल में उतारा जाए
लब तो मजबूर हैं ख़ामोश रहा करते हैं
सोचता हूँ उसे नज़रों से पुकारा जाए
तुम ने जाते हुए कुछ ऐसी कही थीं बातें
जो कि दिल चीर दें और सीने में भाला जाए
‘ऐश-ओ-आराम नहीं अहल-ए-करम फ़िक्र करें
चीख़ते लोगों के भी मुँह में निवाला जाए
उस ने बस्ती को हक़ारत की नज़र से देखा
उस को तोहफ़े में दिया फूल भी काला जाए
— Sakib Mazeed















