bahaarein kab labon ko kholti hain | बहारें कब लबों को खोलती हैं

  - SALIM RAZA REWA

बहारें कब लबों को खोलती हैं
बड़ी हसरत से कलियाँ देखती हैं

भले ख़ामोश हैं ये लब तुम्हारे
मगर आँखें बहुत कुछ बोलती हैं

 
अमीर-ए-शहर का क़ब्ज़ा है लेकिन

ग़रीबों की दीवारें टूटती हैं
 

समुंदर को कहाँ ख़ुश्की का डर है
वो नदिया हैं जो अक्सर सूखती हैं

 
न जाने कब हटा दें ज़ुल्फ अपनी

उन्हें एक टक ये आँखें देखती हैं
 

रज़ा है रब का ये अहसान मुझपर
जो खुशियाँ मेरे घर में खेलती हैं

  - SALIM RAZA REWA

Hasrat Shayari

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