ख़ुशबू घुली नहीं है पवन में अभी तलक
क्या मौसम-ए-ख़िज़ाँ है चमन में अभी तलक
मेरे सुनहरे ख़्वाब जलाकर हैं ख़ुश बहुत
करते हैं शोले रक़्स कफ़न में अभी तलक
इस रौशनी ने हमको चबाया है इस क़दर
दाँतों के हैं निशान बदन में अभी तलक
हर धर्म के गुलो से महकता है ये चमन
ख़ुशबू बसी है मेरे वतन में अभी तलक
अब तो बदन में पहले सी ताक़त नहीं रही
लज़्ज़त मगर वही है सुख़न में अभी तलक
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by SALIM RAZA REWA
our suggestion based on SALIM RAZA REWA
As you were reading Corruption Shayari Shayari