बैठा हूँ अकेला मैं किसी रोड़ किनारे
दुनिया के नहीं तेरी ही यादों के सहारे
उलझे हुए हैं आज भी दुनिया में कहीं हम
फ़ुर्सत नहीं मिलती कि तिरी ज़ुल्फ़ सँवारे
हर रीत ज़माने की 'समर' तोड़ दूँ मैं बस
इक बार मुझे कोई तो शिद्दत से पुकारे
— salman khan "samar"















