ग़ैरत को अपनी मार के बैठा हुआ हूँ मैं
सर को झुका के आप के आगे खड़ा हूँ मैं
अख़लाक़ मेरे काम में आएँ कभी मिरे
ये सोच कर नसीब से लड़ता रहा हूँ मैं
कहने को लाख लोग है साथी मिरे मगर
दुनिया में एक शख़्स की दुनिया बना हूँ मैं
वो पूछती हैं हाल मिरा इस तरह से अब
जैसे उसी के अपने सवालात सा हूँ मैं
हसरत से देख लो मुझे कुछ और पल 'समर'
मुद्दत के बा'द तुम को नज़र आ गया हूँ मैं
— salman khan "samar"















