मैं टूट कर बिखर चुका हूँ इंतिज़ार में
पड़ता नहीं हूँ पर मैं मुसाफ़िर के प्यार में
आया नहीं यक़ीं कि दग़ा दे रहा है दोस्त
मारा गया हूँ मैं तो इसी ए'तिबार में
इक नौकरी की चाह में फिरते हैं दर-ब-दर
हम रोज़ मर रहे हैं यहाँ रोज़गार में
लड़कों को जिस्म का कभी भूखा न मानिए
अक्सर वो जान दे दिया करते हैब प्यार में
'सलमान' इस जहाँ को यहीं छोड़ कर चलो
बैठा है कोई शख़्स वहाँ इंतिज़ार में
— salman khan "samar"















