कश्ती पर ऐसा भार न हो
जिस से ये दरिया पार न हो
टूटो तो इतना ही टूटो
जितने से दिल बीमार न हो
फूल बिछाओ राह में उस की
याद रहे कोई ख़ार न हो
ग़लती हो भी तो ऐसी हो
ग़लती वो जो हर बार न हो
तामीर करो घर, घर जैसा
घर वो जिस में दीवार न हो
— Samar Pradeep
जिस से ये दरिया पार न हो
टूटो तो इतना ही टूटो
जितने से दिल बीमार न हो
फूल बिछाओ राह में उस की
याद रहे कोई ख़ार न हो
ग़लती हो भी तो ऐसी हो
ग़लती वो जो हर बार न हो
तामीर करो घर, घर जैसा
घर वो जिस में दीवार न हो
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