ज़ह्न भटका है हवा सेों में भी होने के बा'द
मुतमइन हूँ मैं मेरी कश्ती डुबोने के बा'द
पास कुछ भी न रहा अब तो गँवाने के लिए
इज़्ज़त-ए-नफ़्स को अपनी यहाँ खोने के बा'द
जिस को सौंपा था हिफ़ाज़त के लिए दिल अपना
उस ने ही तोड़ दिया दिल भी खिलौने के बा'द
आरज़ू करते हैं फिर लोग समर पाने की
ज़ीस्त में काँटे हर इक शख़्स की बोने के बा'द
एक काँधा भी मुयस्सर नहीं मुख़्लिस का मुझे
हुआ हर बार ये एहसास भी रोने के बा'द
देख हैरत से रहा था जो तअस्सुर मेरे
पुश्त में नेज़े को मेरी वो चुभोने के बा'द
कोई तो रात सना ऐसी मुबारक हो मुझे
फिर सहर देख न पाऊँ कभी सोने के बा'द
— Sana Hashmi















