पहले अलम के वास्ते झूठी हँसी ईजाद की
फिर क़ल्ब बहलाने के ख़ातिर शाइरी ईजाद की
मरना पड़ा इक नइँ हज़ारों मर्तबा याँ जीते जी
आख़िर में तब जाके यहाँ ये ख़ुद-कुशी ईजाद की
इस ख़ल जहाँ में चार बहनों ने गँवाकर अपनी जाँ
तब जाके इक भाई की फिर याँ ज़िंदगी ईजाद की
होता दिखावा सिर्फ़ कुछ ही रोज़ का मेहमान, सो
ता'उम्र रहने वाली फिर यह सादगी ईजाद की
इतरा न ले कोई यहाँ बेशी पे अपनी इसलिए
ख़ालिक़ ने सब में कुछ न कुछ नाज़ुक कमी ईजाद की
पथरा के आँखों की यहाँ बीनाई हो जाए न ख़त्म
सो रौशनी के वास्ते इन
में नमी ईजाद की
तलवार के सर हर दफ़ा आए न याँ इल्ज़ाम सो
आघात करने के लिए तानाकशी ईजाद की
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