हम सेे पूछो सहना क्या-क्या पड़ता है

ख़ुद का आँसू ख़ुद ही धोना पड़ता है

दुनिया वालों को भाता हँसता चेहरा
सो हम को छुप-छुप के रोना पड़ता है

बिस्तर तकिया करवट फिर उन का चेहरा
इतने में बस हम को जीना पड़ता है

मिलने जाना होता है जब भी उन से
सीधे बच्चे जैसा दिखना पड़ता है

ज़ूम करोगे फोटो तो फट जाएगी
रिश्तों को आहिस्ता पढ़ना पड़ता है

बैठे किस को मिलती है मंज़िल यारों
पत्थर पर भी दूब उगाना पड़ता है

रात जगे रहते तेरे सपने ख़ातिर
तब तो हम को दिन में सोना पड़ता है

आफ़त जब-जब आती है मज़लूमों पर
बूंदों को भी सागर बनना पड़ता है

— Santosh sagar

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