मिरी शोहरत को वो अपना बता के ख़ुश बहुत ही हैं

उन्हें देखो वो मेरा दिल दुखा के ख़ुश बहुत ही हैं

अभी भी याद है नंबर मगर अब कॉल नईं करता
किसी के साथ अब वो घर बसा के ख़ुश बहुत ही हैं

ग़ज़ल का शे'र,मतला बोलकर के ख़ुश नहीं थे वो
हमारे नाम का मक़्ता सुना के ख़ुश बहुत ही हैं

हमारे प्यार को बदनाम कर के कुछ नहीं पाई
मगर माँ-बाप की इज़्ज़त बचा के ख़ुश बहुत ही हैं

कभी 'सागर' के अहसानों तले जीते थे मरते थे,
नशा अब वो अमीरी का दिखा के ख़ुश बहुत ही हैं

— Santosh sagar

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