दोस्त, गलियाँ, शहर, घर सारे पुराने हो गए

उस तअल्लुक़ और मुहब्बत को ज़माने हो गए

अब कहाँ वो चाहतें ,वो महफ़िलें, वो रौनकें
हर किसी के अपने-अपने आशियाने हो गए

अब नसीहत बोझ लगती है बुज़ुर्गों की उन्हें
शहर में पढ़ लिख के बच्चे सब सियाने हो गए

उस में सारे रंग हैं शोख़ी, अदा और सादगी
मुफ़्त में थोड़ी न सब उस के दिवाने हो गए

इस क़दर फैली तरक़्क़ी की वबा इस दौर में
खेतियाँ कल तक जहाँ थीं कारखाने हो गए

— Sapna Jain

More by Sapna Jain

Other ghazal from the same pen

See all from Sapna Jain →

Mohabbat Shayari Collection

Shers of mohabbat shayari collection.

All Mohabbat Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling