kise khabar thii ki is ko bhi toot jaana tha | किसे ख़बर थी कि इस को भी टूट जाना था

  - Sarfraz Nawaz

किसे ख़बर थी कि इस को भी टूट जाना था
हमारा आप से रिश्ता बहुत पुराना था

हम अपने शहरस हो कर उदास आए थे
तुम्हारे शहरस हो कर उदास जाना था

सदा लगाई मगर कोई भी नहीं पल्टा
हर एक शख़्स न जाने कहाँ रवाना था

यूँँ चुप हुआ कि फिर आँखें ही डबडबा उट्ठीं
न जाने उस को अभी और क्या बताना था

किसे पड़ी थी मिरा हाल पूछता मुझ से
मुझे तो रस्म निभानी थी मुस्कुराना था

भनक न जाने ये कैसे लगी हवाओं को
कि मुझ को राहगुज़र पर दिया जलाना था

छुपी थी इस में ही तम्हीद भी जुदाई की
हमारा आप से मिलना तो इक बहाना था

तुझे ख़बर ही नहीं मेरे जीतने वाले
तिरे लिए तो हमेशा ही हार जाना था

निगाह-ए-शौक़ से यूँँ ग़ैर को तिरा तकना
'नवाज़' और नहीं कुछ मुझे सताना था

  - Sarfraz Nawaz

Romance Shayari

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