“ख़्वाब”
मैं दिन में माहताब देखता हूँ
मैं रातों को आफ़ताब देखता हूँ
मैं आँखों में हिजाब देखता हूँ
मैं अश्कों को शराब देखता हूँ
मैं सवालों में जवाब देखता हूँ
मैं किताबों को शादाब देखता हूँ
मैं ख़ुद को बे-नक़ाब देखता हूँ
मैं तुझ को बे-हिसाब देखता हूँ
मैं हर सपना नायाब देखता हूँ
यूँ ही नहीं इतने ख़्वाब देखता हूँ
— Sahil Verma















