क़फ़स की ओर मेरा रास्ता पलट आया

मैं पा-ब-जौलाँ चला थक गया पलट आया

हज़ार मिन्नतें इस दर पे धूल फाँकती हैं
यहाँ पे क्यूँ ये दिल-ए-ग़मज़दा पलट आया

खिला हुआ था सिरहाने पे इक गुलाब का फूल
मैं उस मज़ार से बे-फ़ातिहा पलट पाया

वो जिस के वास्ते मैं वास्तों का हामी था
वो शख़्स आज बिला वास्ता पलट आया

किसी से वादा-ख़िलाफ़ी न हो सो मस्लहतन
मैं अपने अहद से बे-साख़्ता पलट आया

वो एक हादसा जिस से गुरेज़-पा थे हम
किसी के साथ वही हादसा पलट आया

किसी पे अब से खुलेंगे रुमूज़-ए-तीरा-शबी
किसी के कमरे का मैं आईना पलट आया

— Shadab Javed

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