शे'र अच्छा कोई हुआ ही नहीं

ख़ास कहने को कुछ रहा ही नहीं

रूठ कर चेहरे को जो फेर लिया
एक मिसरा भी फिर हुआ ही नहीं

इस तरह से जुदा हुआ मुझ से
जैसे मेरा कभी वो था ही नहीं

ढ़ाई अक्षर की बात मैं ने लिखी
लफ़्ज़ उस ने कोई पढ़ा ही नहीं

तुम बताते रहे बुतों को ख़ुदा
बुत ये कहते रहे ख़ुदा ही नहीं

राब्ता जिस से तुम को करना था
शख़्स वो मुझ में अब रहा ही नहीं

हैं सुख़नवर जहाँ में और मगर
मीर जैसा कोई हुआ ही नहीं

— Shadan Ahsan Marehrvi

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