शे'र अच्छा कोई हुआ ही नहीं
ख़ास कहने को कुछ रहा ही नहीं
रूठ कर चेहरे को जो फेर लिया
एक मिसरा भी फिर हुआ ही नहीं
इस तरह से जुदा हुआ मुझ सेे
जैसे मेरा कभी वो था ही नहीं
ढ़ाई अक्षर की बात मैंने लिखी
लफ्ज़ उसने कोई पढ़ा ही नहीं
तुम बताते रहे बुतों को ख़ुदा
बुत ये कहते रहे ख़ुदा ही नहीं
राब्ता जिस सेे तुमको करना था
शख़्स वो मुझ में अब रहा ही नहीं
हैं सुख़नवर जहाँ में और मगर
मीर जैसा कोई हुआ ही नहीं
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