उन निगाहों को जबसे देखा है
होश दर-दर भटकते देखा है
रंज राहत में ढलते देखा है
जब भी उसको सँवरते देखा है
सुर्ख़ फूलों से उड़के तितली को
उसके लब पर ठहरते देखा है
'इश्क़ की आड़ में दो जिस्मों को
मैंने कपड़े बदलते देखा है
मौत से जो नहीं डरा उसको
मैंने फुरक़त से डरते देखा है
तेरी ख़्वाहिश में जाने कितनों का
दम-ब-दम दम निकलते देखा है
तेरे दीदार के लिए शब भर
चाँद छत पर टहलते देखा है
ज़िंदा रहने की कश्मकश में भी
मैंने लोगों को मरते देखा है
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