फ़रेब देती हुई मेहरबानियों से मुझे
किसी ने खींच लिया ख़ुश-गुमानियों से मुझे
खुला कि मैं अभी अज़बर नहीं हुआ उस को
वो याद रखता है मेरी निशानियों से मुझे
मैं अपने आप को शक की नज़र से देखता हूँ
वो दुख मिले हैं तेरी बद-गुमानियों से मुझे
मैं जानता हूँ किसी रोज़ बेचने के लिए
बचा रहा है कोई राएगाँनियों से मुझे
मेरे ख़ुदा मेरे माथे पे जावेदाँ लिख कर
किया है किस लिए मंसूब फ़ानियों से मुझे
मैं इक ख़ज़ाना हूँ पहचान को तरसता हुआ
निकालता ही नहीं कोई पानियों से मुझे
कुछ इस लिए भी मेरी नींद उड़ गई 'शाहिद'
सुला रहा था वो सच्ची कहानियों से मुझे
— Shahid Zaki















