उन की आँखों में कहीं ख़ार नज़र आते हैं

मेहरबाँ मुझ पे मेरे यार नज़र आते हैं

दिल दुखाने सदा तैयार नज़र आते हैं
मुझ से जलते हुए दो चार नज़र आते हैं

मरने वाले की सभी करते हैं ता'रीफ़ यहाँ
ज़िंदा हैं जो यहाँ बेकार नज़र आते हैं

उन के हर ख़्वाब किए हम ने है पूरे लेकिन
हम तो उन को भी गुनहगार नज़र आते हैं

एक दिन वक़्त का खाएँगे तमाचा वो भी
आज जो चेहरे से अंगार नज़र आते हैं

ज़र ज़रा सा जो हुआ पास में मेरे 'शाकिर'
सब के सब मेरे तरफ़दार नज़र आते हैं

— Shakir Sheikh

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