बे-ग़रज़ वो बच्चों से कर रही मोहब्बत है

माँ के जैसी उल्फ़त की और कौन मूरत है

माँ की आँखों से बहता क़तरा भी समुंदर है
मत दुखाओ दिल माँ का माँ से ही तो जन्नत है

उम्र माँ के क़दमों में हो बसर मेरी सारी
बस यही तो छोटी सी मेरी एक हसरत है

अपने रोते बच्चे को पल में ही हँसा दे जो
गोद माँ की, झूला है, चैन की अलामत है

लिक्खी है ग़ज़ल मैं ने माँ के नाम ये 'शाकिर'
माँ से बढ़ के दुनिया में कोई भी न दौलत है

— Shakir Sheikh

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