तपती हुई दोपहर का साया अलग किया
कल रात तेरी याद से रिश्ता अलग किया
इस दर्जा तेरे हिज्र का सदमा लगा मुझे
बिस्तर अलग किया कभी कमरा अलग किया
इक दोस्त मिल गया था अदू के लिबास में
सो मैंने आस्तीन का झगड़ा अलग किया
रिश्तों की एक नींव जो कच्ची निकल गई
तो मैंने अपने गाँव का रस्ता अलग किया
चुभने लगा था फूल जब उसकी निगाह में
तब उसने मेरे पाँव का काँटा अलग किया
गूँजी मेरी लहद में तेरी आह की सदा
ये किसने तेरे कान का झुमका अलग किया
हम दो बदन के दरमियाँ में जान एक थे
फिर तुमने मुझको किस लिए आधा अलग किया
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