तेरे घर के ज़रा आगे जली सिगरेट

न जाने फिर कहाँ कितनी चली सिगरेट

कभी ग़म में कभी यारी में चल जाती
न जाने कितनी तो घर में पली सिगरेट

तुझे जाते समय भी बोला था मैं ने
कि तेरे बा'द जो पी सब ख़ाली सिगरेट

तेरी सूरत किसी दिन याद आई तो
इन्हीं हाथों में रक्खी और मली सिगरेट

कभी खींची कभी फेंकी कभी बाँटी
मेरे अंदर बहुत फूली फली सिगरेट

तुझे ग़ैरों की छत गलियाँ मुबारक हों
मुझे तो बस मुबारक हो गली सिगरेट

न तस्वीरें न वो बातें न कोई और
तेरी ख़ातिर बहुत तड़पी भली सिगरेट

अभी तक पीते हो तो छोड़ भी दो अब
तुम्हारे तो रगों-जाँ में ढली सिगरेट

नहीं कोई तुम्हारा 'शांतनु' पर फिर
तुम्हारे तो गले लग कर चली सिगरेट

— Shantanu Sharma

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