guzar raha hai vo lamha to yaad aaya haius ek pal se kabhi kitna khauf khaaya hai | गुज़र रहा है वो लम्हा तो याद आया है

  - Shariq Kaifi

गुज़र रहा है वो लम्हा तो याद आया है
उस एक पल से कभी कितना ख़ौफ़ खाया है

उसी निगाह ने आँखों को कर दिया पत्थर
उसी निगाह में सब कुछ नज़र भी आया है

ये तंज़ यूँँ भी है इक इम्तिहान मेरे लिए
तिरे लबों से कोई और मुस्कुराया है

बहे रक़ीब के आँसू भी मेरे गालों पर
ये सानेहा भी मोहब्बत में पेश आया है

ये कोई और है तेरी तरफ़ सरकता हुआ
अंधेरा होते ही जो मुझ में आ समाया है

हमारे 'इश्क़ से मरऊब इस क़दर भी न हो
ये ख़ूँ तो एक अदाकार ने बहाएा है

यहाँ तो रेत है पत्थर हैं और कुछ भी नहीं
वो क्या दिखाने मुझे इतनी दूर लाया है

बहुत से बोझ हैं दिल पर ये कोई ऐसा नहीं
ये दुख किसी ने हमारे लिए उठाया है

  - Shariq Kaifi

Tanz Shayari

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