ye kuchh badlaav sa achha laga hai | ये कुछ बदलाव सा अच्छा लगा है

  - Shariq Kaifi

ये कुछ बदलाव सा अच्छा लगा है
हमें इक दूसरा अच्छा लगा है

समझना है उसे नज़दीक जा कर
जिसे मुझ सा बुरा अच्छा लगा है

ये क्या हर वक़्त जीने की दुआएँ
यहाँ ऐसा भी क्या अच्छा लगा है

सफ़र तो ज़िंदगी भर का है लेकिन
ये वक़्फ़ा सा ज़रा अच्छा लगा है

मिरी नज़रें भी हैं अब आसमाँ पर
कोई महव-ए-दुआ अच्छा लगा है

हुए बरबाद जिस के 'इश्क़ में हम
वो अब जा कर ज़रा अच्छा लगा है

वो सूरज जो मिरा दुश्मन था दिन भर
मुझे ढलता हुआ अच्छा लगा है

कोई पूछे तो क्या बतलाएँगे हम
कि इस मंज़र में क्या अच्छा लगा है

  - Shariq Kaifi

Broken Shayari

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