गर सारे उरूज़ ही जवाल होते तो सोचो क्या होता
दिलों में फकत हसीं ख़याल होते तो सोचो क्या होता
अंधेरा मिटाने को घरों से निकले हैं बस चंद रहनुमा
सभी के हाथों में गर मशाल होते तो सोचो क्या होता
बड़ी ख़ामोशी से सहते रहते हैं सियासत के ज़ुल्मो को
आवाम के ज़बान पर भी सवाल होते तो सोचो क्या होता
ज़ुल्म सहते रहने से तो कहीं बेहतर है मर जाना
सभी के लहू में गर उबाल होते तो सोचो क्या होता
जाती, मजहब, रंग, लिंग, और ना जाने क्या क्या हैं
गर इनके नाम पर ना बवाल होते तो सोचो क्या होता
खुशी-ओ-ग़म का मुकम्मल सफर है ज़िन्दगी "निहार"
एक जैसे गर दोनों सूरत-ए-हाल होते तो सोचो क्या होता
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