gar saare urooj hi jawaal hote to socho kya hota | गर सारे उरूज़ ही जवाल होते तो सोचो क्या होता

  - Shashank Tripathi

गर सारे उरूज़ ही जवाल होते तो सोचो क्या होता
दिलों में फकत हसीं ख़याल होते तो सोचो क्या होता

अंधेरा मिटाने को घरों से निकले हैं बस चंद रहनुमा
सभी के हाथों में गर मशाल होते तो सोचो क्या होता

बड़ी ख़ामोशी से सहते रहते हैं सियासत के ज़ुल्मो को
आवाम के ज़बान पर भी सवाल होते तो सोचो क्या होता

ज़ुल्म सहते रहने से तो कहीं बेहतर है मर जाना
सभी के लहू में गर उबाल होते तो सोचो क्या होता

जाती, मजहब, रंग, लिंग, और ना जाने क्या क्या हैं
गर इनके नाम पर ना बवाल होते तो सोचो क्या होता

खुशी-ओ-ग़म का मुकम्मल सफर है ज़िन्दगी "निहार"
एक जैसे गर दोनों सूरत-ए-हाल होते तो सोचो क्या होता

  - Shashank Tripathi

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