मैं भले उस को नईं मानता हूँ
पर वो है इतना तो जानता हूँ
मेरी भी ज़िन्दगी है ये कोई?
ख़ाक हूँ, ख़ाक को छानता हूँ
ढूँढ़ लूँगा अगर खो गए तुम
ख़ुद को इतना मैं पहचानता हूँ
तुम रुलाना अगर जानती हो
तो भुलाना मैं भी जानता हूँ
जान दूँ क्या मैं इस बात पर अब
मेरी ग़लती है, मैं मानता हूँ
— karan singh rajput















