इक रोज मैं अपने घर से आजमाया जाऊंगा
मुझको पता है हर जगह से मैं ठुकराया जाऊंगा
मुझको उठाने में लगे है आदमी कमजोर से
हाँ लाश हूँ, पर मुर्दो से थोड़ी उठाया जाऊंगा
ये सोचके तो दूसरी कोई मिट्टी को छु'आ नहीं
के बाद मरने के हिन्दुस्तां में दफनाया जाऊंगा
दो -चार दिन में भूल जायेगें मिरे अपने मुझे
मैं कोइ होली, दशहरा हूँ जो मनाया जाऊँगा
दुख है ये की, मैं काम ना आया किसी के, और फिर
मैं तो क़िस्सा भी नहीं, कि बच्चों को सुनाया जाऊंगा
मैं हूँ अभी तो कुछ इज्जतदार, जब तलक़ के हूँ ज़िंदा
और बाद मरने के किसे ख'बर क्या बताया जाऊंगा
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