कोई तो काम आए अब ख़ुद कुशी हमारी
चुभने लगी है हम को ये ज़िंदगी हमारी
मालूम ही नहीं था तुझ को ये ग़म हमारा
दिल में तड़प रही है क्यूँ बेख़ुदी हमारी
कैसे यक़ीन करता ख़ुद पर यहाँ मैं लोगों
हम को जो खा रही थी ये ख़ामुशी हमारी
कैसे करें बयाॅं हम ये शब्द में उन्हें अब
चरणों में जिन के है अब ये बंदगी हमारी
अब ख़ैर मर न जाए आलम है ये हमारा
हम ने ये छोड़ दी गर ये शा'इरी हमारी
वो एक उम्र से हैं नाराज़ हम से आख़िर
हम क्यूँ दिखा न पाए थे सादगी हमारी
ख़ुद आप ही लगा लें मिट्टी को हम किनारे
देखी न जा सकेगी अब बेबसी हमारी
— Shivam Raahi Badayuni















