हों जवाँ जब समझ नहीं आता
सब्र मतलब समझ नहीं आता
तजरबे 'उम्र से ही मिलते हैं
ये मगर तब समझ नहीं आता
अजनबी जाने कौन है उस
में
आइना अब समझ नहीं आता
कोई रहबर पता बताए मुझे
है कहाँ रब समझ नहीं आता
क्यूँँ लकीरों में तुम नहीं हो मेरी
रोता हूँ जब समझ नहीं आता
कैसे कह दूँ बिछड़ गया तुम सेे
तुम मिलीं कब समझ नहीं आता
दूर रहने से 'इश्क़ बढ़ता है
मुझको साहब समझ नहीं आता
ग़म ग़लत शाम को जो करता हूँ
क्यूँँ ख़फ़ा सब समझ नहीं आता
जो कभी पीने बैठ जाऊँ शिवम्उठना है कब समझ नहीं आता
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