वफ़ा सब से निभाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते
हमारा ख़ूँ जलाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते
हमारे ख़्वाब में आकर दरीचा खटखटाते हो
मगर फिर लौट जाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते
तुम्हारा ज़िक्र होता है छलक पड़ती हैं ये आँखें
हमें इतना रुलाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते
हमें तुम रोज़ कहते हो मिलेंगे रात को छत पर
मगर फिर भूल जाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते
लबों के पास तक आ कर जो रस्ता मोड लेते हो
तहम्मुल आज़माते हो ये तुम अच्छा नहीं करते
हमीं से है तुम्हें निस्बत ये तुम दिन रात कहते हो
हमीं से ऊब जाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते
हमें मालूम है यारा तुम्हारा हाल-ए-दिल हम सेे
'शिवांग' अब भी छुपाते हो ये तुम अच्छा नहीं करते
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